उत्तर प्रदेश

राम मंदिर भूमि पूजन के दिन राम के वन लौटने जैसा रहेगा नजारा

रामजन्मभूमि में विराजमान रामलला के मंदिर निर्माण की बेला में भूमि पूजन के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आगमन पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए दशरथ राजमहल बड़ा स्थान के महंत बिंदुगद्याचार्य स्वामी देवेन्द्र प्रसादाचार्य ने कहा कि इस गौरवशाली क्षण के लिए रोमांचित हूं। उन्होंने कहा हमारे आराध्य को रामायण काल में 14 वर्ष का वनवास हुआ लेकिन कलिकाल का वनवास तो और भी लंबा हो गया। फिर भी प्रतीक्षा खत्म हो गयी और शुभ घड़ी आ गयी है तो हम सभी अतिशय प्रसन्न हैं और ऐसी दीवाली मनाने की तैयारी कर रहे जो हमें त्रेतायुग की अनुभूति करा दे।

बिंदुगद्याचार्य महाराज ने कहा कि देश की आजादी के बाद ही इस विवाद का निपटारा हो जाना चाहिए था लेकिन इच्छा शक्ति के अभाव मामले को टाल दिया गया जिसके कारण धीरे-धीरे घाव नासूर बन गया। उन्होंने कहा कि यह विषय राजनीति का नहीं था क्योंकि राम हमारे आराध्य ही नहीं भारतीय संस्कृति के शलाका पुरुष थे। गुलामी के कालखंड में जो घटनाएं हुई, आजादी के बाद उनका परिमार्जन करना हमारा अधिकार था। उसी अधिकार का प्रयोग करके सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। उसी श्रृंखला में देश के मानबिंदुओं के मर्यादा की रक्षा की जानी थी। फिर भी इस विषय को राजनीति के हवाले कर हिन्दू समाज को अपमानित किया गया।

उन्होंने कहा कि अब ईश्वर की कृपा मानी जाए अथवा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की न्यायप्रियता या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की संवेदनशीलता कि मामले का पटाक्षेप हो गया है। इसके सभी धन्यवाद के पात्र हैं और हम सभी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए भगवान सीताराम से मंगलमय भविष्य की प्रार्थना भी करते हैं। उन्होंने कहा कि रामराज्य की परिकल्पना एक आदर्श शासन व्यवस्था के संदर्भ में होती। परमात्मा श्रीराम का अवतरण मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए हुआ। उनके आदर्शों को अपनाकर ही आदर्श समाज और राज्य की व्यवस्था संभव है। फिर भी सुनियोजित तरीके से साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखने की कोशिश की गयी और विवाद को तूल दिया गया।

रामराज्य की स्थापना का अब वक्त आ गया
फिर भी अनेक झंझावतों से गुजरते हुए रामराज्य की स्थापना का अब वक्त आ गया है। रामराज्य का तात्पर्य है कि ‘ सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती.. ‘। उन्होंने कहा कि इस देश की माटी और संस्कृति ही निरपेक्ष है जिसमें अनेकानेक संस्कृतियों का समावेश है। यहां अनेक मत-मतांतर के लोग सह अस्तित्व के साथ रहते हैं। उन्हें उपासना और अभिव्यक्ति के साथ जीवन यापन की पूरी आजादी है। उन्हें यह अधिकार कानून मिला है तो इसके मूल में राम और राम संस्कृति ही  है। 

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