Bihar Election 2020
बिहार विधानसभा चुनाव 2020

बिहार चुनाव 2020 : कभी मैदान में गूंजते थे समाजवादी नारे, अब सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर जंग

आजादी के बाद 1952 से लेकर 1969 तक बिहार के चार विधानसभा चुनावों में मंच से तरह-तरह के समाजवादी नारे लगते थे। इंदिरा गांधी ने 1971 के संसदीय चुनाव में गरीबी हटाओ का नारा दिया और 1975-77 के जयप्रकाश आंदोलन के नारे- ‘ सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ से इंदिरा गांधी की सरकार पलट गई। बोफोर्स तोप घोटाले को मुद्दा बनाकर 1989 में चुनाव मैदान में उतरे विश्वनाथ प्रताप सिंह की ब्रांडिंग के लिए सभाओं में नारा गूंजा- राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है। अब दौर बदला है और जगह भी। इस बार सोशल मीडिया पर नारेबाजी चल रही है- कहीं डबल इंजन सरकार के पक्ष-विपक्ष में, तो कहीं सुशासन के पक्ष-विपक्ष में।
कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए खुले मैदान में चुनावी सभाओं में श्रोताओं की संख्या सीमित रहेगी। लिहाजा राजनीतिक दलों और राजनेताओं के फेसबुक, व्हाट्सएप और ट्विटर पर घमासान मचा है। दलों का आईटी सेल और उम्मीदवारों के पीआर मैनेजर 24 घंटे अलर्ट हैं। अपनी पार्टी और उम्मीदवार की ब्रांडिंग तथा प्रतिद्वंद्वी को काउंटर करने के लिए लैपटॉप-मोबाइल पर जुमलों, नारों व कैप्शन के रूप में मारक हथियार गढ़े जा रहे हैं। पीआर मैनेजर अपने ग्राहक को समझा रहे हैं …जमीन पर आप जितने लोगों से मिलेंगे, जितनी दूरी तय करेंगे, हम उससे अधिक रेंज तक निशाना साधेंगे। आप दिन भर में सौ -दो सौ लोगों से मिलेंगे और हम एक घंटे में हजारों लोगों तक आपका इंटरव्यू, फोटो व मुद्दा पहुंचा देंगे।  

समाजवादियों ने तरह-तरह के सपने बोए
स्वतंत्रता सेनानी एवं साहित्यकार रामबृक्ष बेनीपुरी 1952 और 1957 के विधानसभा चुनावों में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर कटरा से चुनाव लड़े। दूसरे प्रयास में उन्हें जीत मिली। वे 25 दिसंबर 1951 को अपनी डायरी में लिखते हैं कि, ‘लोगों ने तरह-तरह के नारे भी गढ़ लिए हैं। कुछ नारे तो सीधी चोट करने वाले हैं- नेहरू राज की एक पहचान, नंगा-भूखा हिन्दुस्तान! मांग रहा है हिन्दुस्तान, रोटी कपड़ा और मकान!  ….ये नारे सुनते ही गरीबों की आंखें चमक उठती हैं।  

मालिक हो मजदूर-किसान
औराई से लगातार छह चुनाव जीत चुके समाजवादी दिग्गज एवं पूर्व मंत्री गणेश प्रसाद यादव के पिता पांडव राय भी कटरा उत्तरी से 1962 में और औराई से 1969 में क्रमश: निर्दलीय और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते। गणेश प्रसाद यादव तब छात्र हुआ करते थे। वे बताते हैं, दोनों चुनावों में कई नारे बहुत लोकप्रिय हुए थे-‘संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावै सौ में साठ। …डॉ. लोहिया का अरमान, मालिक हो मजदूर-किसान, …. राष्ट्रपति हो या भंगी की संतान, सब की शिक्षा एक समान।’

दलों के वार रूम से सीधा निशाना
आज राजनीतिक दलों का ‘वार रूम’ सालों भर काम कर रहा है। एक प्रदेश में चुनाव संपन्न होते ही दूसरे प्रदेश में जंग की तैयारी शुरू हो गई। जिला से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक राजनीतिक दलों की कमेटी के समानांतर आईटी सेल और मीडिया सेल काम कर रहा है। पहले वार रूम में चुनावी सभाओं-रैलियों की रणनीति बनती थी। कोरोना की वजह से आज सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर जंग के लिए शब्दों, नारों के हथियार तैयार हो रहे हैं। अलग-अलग दलों के लड़ाके अपने लिए लैपटॉप-कंप्यूटर के साथ पॉलिटिकल मैनेजर बहाल कर चुके हैं। दिल्ली, पटना और मुजफ्फरपुर में बैठे पीआर मैनेजर प्रतिद्वंद्वी उम्मीवारों पर घात लगाए बैठे हैं। दिन-रात पोस्ट, ग्राफिक्स, वीड़ियो और फोटो से लैस हथियार दागे जा रहे हैं।

गाना, वीडियो और कविताओं से बातों को बनाते असरदार
भाजपा, जेडीयू और कांग्रेस जैसे साधन संपन्न दलों के आईटी सेल में काम कर रहे प्रोफेशनल अलग से अपनी टीम खड़ी कर चुके हैं। आईटी सेल में काम करने के अनुभव के आधार पर वे सीधे मंत्री, सांसद, विधायकों एवं भावी उम्मीदवारों से कांट्रैक्ट कर रहे हैं। देश के बड़े संस्थानों से पत्रकारिता एवं पीआर मैनेजमेंट का कोर्स कर चुके प्रोफेशनल इस टीम में पोस्ट तैयार कर रहे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से डिग्री लेकर आये एक पॉलिटिकल मैनेजर बताते हैं- हम गाना, वीडियो और कविताओं के प्रयोग से बातों को असरदार बना रहे हैं। हर घंटे चुनावी ट्रेंड के अनुसार अपने ग्राहक के पक्ष में सोशल मीडिया पर रोचक कंटेंट अपलोड कर उसे वायरल करते हैं।

Share This Post
Kunal Raj
Editor-In-Chief l Software Engineer l Digital Marketer