समस्तीपुर

समस्तीपुर: नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय..

समस्तीपुर । सुल्तानपुर की मिट्टी का लाल अमन.. तिरंगे में लिपट घर आया। लोगों ने आंखों में ही रात काट सुबह कर दी थी। जुबां पर सिर्फ एक ही बात.. कैसे सोऊं सुकून की नींद, सुकून से सुलाने वाला तो धरा के आगोश में समा गया। शुक्रवार की सुबह.. परिदों की नींद भी वंदे मातरम के जयघोष से टूटी थी। क्षितिज की लालिमा में तिरंगे की छटा नजर आ रही थी। मां भारती की गोद में अमन चैन से चिरनिद्रा में सोया था। सुल्तानपुर के इस लाल ने अपनी शहादत से मिट्टी का कर्ज उतार दिया था। सड़क के दोनों ओर लोगों की भीड़ ऐसी कि महानायक की बस एक झलक मिल जाए। लोगों के हाथों में फूल की थालियां थीं। जैसे ही शहीद अमन का पार्थिव शरीर लेकर सेना के जवानों की गाड़ी घुसी, मोहिउद्दीननगर बाजार लोगों से पट गया। चारों ओर सिर्फ तिरंगा और तिरंगा। फूलों की बरसात ने उस वीर का स्वागत किया, जिसने जान की बाजी लगा दी। पर, पीठ नहीं दिखाई। गाड़ी के साथ कारवां बढ़ता चला गया

शहीद की गाड़ी के साथ कारवां बढ़ता चला गया। कुरसाहा जाते-जाते भीड़ बेहिसाब हो गई। शहीद के अमरत्व का उद्घोष ऐसा, मानो आवाज सरहद तक गूंज रही हो। जैसे ही काफिला आनंद गोलवा से गुजरा, महिलाओं और युवाओं की टीम भी उसमें शामिल हो गई। आखिर उनकी मिट्टी का बेटा अब महानायक बन गया था। आनंद गोलवा से रजइसी तक जाने में लगभग आधे घंटे और हसनपुर तक पहुंचने में तकरीबन 40 मिनट से अधिक का समय लग गया। मन में चीन के प्रति आक्रोश का भाव

आंखों में भारत मां की रक्षा का आत्मविश्वास और मन में चीन के प्रति आक्रोश का भाव लिए लोग साथ-साथ चल रहे थे। रजइसी से काफिला जैसे ही आगे बढ़ा, युवाओं के उद्घोष से ही सुल्तानपुर के ग्रामीणों को पता चल गया कि उनका शहीद लाल गांव की दहलीज पर आ चुका है। घर पर चीख-पुकार मच गई। लोगों ने शहीद की विधवा मीनू देवी और बेसुध पड़ी मां रेणु देवी को ढाढ़स बंधाया। कंधे पर ताबूत लिए चार सैनिक नम आंखों के साथ धीरे-धीरे अपना कदम उनके घर की ओर बढ़ा रहे थे। शहीद अमन अमर रहे.. के उद्घोष से दिशाएं गूंज रही थीं। गंगा की धारा देश के लिए अमन की शहादत की साक्षी

गंगा की कलकल धारा देश के लिए अमन की शहादत की साक्षी बन चुकी थी। रात भर रास्तों पर नजर बिछाए लोगों में अमन की एक झलक पाने का उन्माद था। उनकी तस्वीर को अपनी आंखों में सदा के लिए कैद कर लेने के उतावलेपन में लोग सब कुछ भूल चुके थे। पीछे-पीछे सैनिकों का काफिला चल रहा था। जैसे ही ताबूत को खोला गया, पत्नी बेसुध होकर गिर पड़ी। मां के चीत्कार ने उपस्थित जनसैलाब की आंखें नम कर दीं। अ²श्य की ओर देख रहीं पिता की आंखें भी अब बरस रही थीं। उपस्थित जनसमूह के सब्र का बांध टूट पड़ा। कण-कण से बस एक ही आवाज आ रही थी. है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय, जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गए।

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