समस्तीपुर

जितवारपुर में सिर्फ विकास दिखाया, राजनीति खींचातान के कारण मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज भी छीना

जितवारपुर खुश तो समझो जीत पक्की। लेकिन राजनीतिक दलों के नेताओं ने यहां के लोगों से वोट तक ही मतलब रखा। विधानसभा के साथ लोकसभा पहुंचे तो लेकिन जितवारपुर को अपनी दुर्दशा पर छोड़ दिया। जितवारपुर के विकास की नींव पेपर मिल वर्षों पूर्व बंद हो गया। अब तो मिल का कुछ अवशेष ही शेष रह गया है। विकास के नाम पर मेडिकल कॉलेज व इंजीनियरिंग कॉलेज का भी लॉलीपाप दिखाया गया। अब वह भी नहीं। वोट मांगने पहुंच रहे सत्ताधारी व विपक्षी दोनों दलों के नेताओं से मतदाता पूछ रहा है सवाल। सिर्फ अपना ही विकास करोंगे, मेरा कब होगा अब तो मैं अस्थि पंजा बन गई।
मेडिकल व इंजीनियरिंग कॉलेज भी छीना
जितवारपुर स्थित हाउसिंग बोर्ड मैदान में मेडिकल कालेज खोलने की घोषणा हुई। जिससे जितवारपुर के लोगों को विकास का नया सपना दिखा। लेकिन राजनीति खींचातान के कारण मेडिकल कालेज दूसरे प्रखंड में स्थानांतरित हो गया। जबकि मेडिकल कालेज खोलने संबंधी सभी नियमों का यहां पालन हो रहा था। बाद में मेडिकल के बदले इंजीनियरिंग कॉलेज की बात हुई वह भी बाद में शिफ्ट कर दिया गया। वोट मांगने पहुंच रहे दोनों दलों के नेताओं से यहां की युवा सवाल पूछने में गुरेज नहीं कर रही। एक दल विशेष के प्रत्याशी को लोगों ने हुडआउट तक किया।

जितवारपुर में वर्षों पूर्व बंद पेपर मिल के अवशेष ही बचे हुए हैं
पेपर मिल में राज्य सरकार का था 49 प्रतिशत शेयर
पेपर मिल की स्थापना राम विनोद शर्मा के द्वारा किया गया जिसमें राज्य सरकार के 49 प्रतिशत शेयर हुआ करता था। मिल में राज सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर जिला अधिकारी हुआ करते थे। लेकिन आज के तारीख में पेपर मिल के महज कुछ अवशेष ही बचे हैं। पेपर मिल में बनने वाले कागज की मांग बाजार में बहुत थी। कोलकाता, मुंबई, दिल्ली सहित कई राज्यों में यहां के कागज की मांग थी। इस मिल के सहारे हजारों परिवार का रोजी रोटी चलता था।

1972 में पहली बार पेपर मिल में हुई थी तालाबंदी
लोगों का बताना है कि पेपर मिल पर 1972 में पहली बार मजदूर यूनियन के दबाव में तालाबंदी हुई थी। श्री शर्मा ने देश के मशहूर उद्योगपति डालमिया के हाथों 1974 में मिल को बेच दिया। लेकिन वामपंथी मजदूर यूनियनों का दबाव यहां भी बरकरार रहा जिसके कारण डालमिया भी मिल को बंद कर वर्ष 1977 में देश के उद्योगपति बीके झुनझुनवाला के हाथों बेच दिया। बाद में मिल किसी तरह चले इस लिए स्थानीय लोगों के नेतृत्व में ठाकुर पेपर मिल श्रमिक संघ का गठन हुआ। लेकिन तमाम प्रयास के बावजूद महज 1979 में पुन: बंद हो गया। जिसके बाद कई सरकारें आई और गई लेकिन किसी ने पेपर मिल के तरफ मुड़ कर नहीं देखा और मिल का अस्तित्व आज के तारीख में पूरी तरह से खत्म हो गया है। लोगों का कहना है कि इस मिल में काम करने वाले कामगार की मौत भी हो चुकी है लेकिन इनके ग्रेच्युटी और प्रोविडेंट फंड की राशि अब तक इन्हें नहीं मिली।

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