समस्तीपुर

Samastipur News: चार साल के कृषि अनुसंधान को मिला मुकाम

समस्तीपुर। मड़ुवा, धान और अरहर पर पिछले चार साल से चल रहे अनुसंधान को मुकाम मिला। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा में आयोजित आठवीं खरीद अनुसंधान परिषद की बैठक में कुलपति, वरीय वैज्ञानिकों व अनुसंधान में लगे विज्ञानियों के बीच चितन-मंथन के बाद नए प्रभेद की अनुशंसा कर दी गई। विश्वविद्यालय ने राजेंद्र मड़ुवा-वन, राजेंद्र अरहर-दो व सीजेंटा कंपनी द्वारा विकसित धान के प्रभेद को चार वर्षों के ट्रायल के बाद अनुशंसित किया है। राजेंद्र मड़ुवा-वन: विश्वविद्यालय द्वारा 13 वर्षों के अनुसंधान के बाद डॉ. सतीश कुमार सिंह के नेतृत्व में इस प्रभेद को अनुसंधान परिषद की बैठक में पेश किया गया। वहां उसे रिलीज किया गया। विज्ञानी का दावा है कि यह प्रभेद 118 दिनों में तैयार होता है। इसकी उत्पादन क्षमता 48 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है। वहीं, किसान के खेतों में इसका उत्पादन 38 क्विंटल तक लिया गया है। यह सिचित एवं असिचित भूमि के लिए अनुकूल है। इस प्रभेद में रोग नहीं लगते हैं। पूरे बिहार के किसान इसकी खेती आसानी से कर सकते हैं। राजेंद्र अरहर-टू : विश्वविद्यालय के दलहन विभाग के विज्ञानियों द्वारा विकसित अरहर के प्रभेद 247 से 257 दिनों में तैयार होनेवाले प्रभेद की उत्पादन क्षमता 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। रोग प्रतिरोधी एवं कीट प्रतिरोधी है। इससे किसान कम लागत में अच्छा उत्पादन कर सकते। बिहार सहित झारखंड आदि क्षेत्रों में भी विश्वविद्यालय द्वारा इसका प्रत्यक्षण किसानों के खेत में किया गया है। धान का शंकर प्रभेद एस-4001 : सीजेंटा कंपनी द्वारा विकसित इस धान के प्रभेद को विश्वविद्यालय द्वारा चार वर्षों तक परीक्षण किए जाने के बाद इसे किसानों के लिए अनुशंसित किया गया।

कंपनी के पूर्वी भारत डिविजनल के हेड वेदप्रकाश ने बताया कि बिहार के किसानों में यह प्रभेद प्रत्यक्षण के दौरान से ही प्रचलित है और इसकी मांग भी काफी है। 125 से 130 दिनों में तैयार होने वाले इस प्रभेद के चावल मध्यम एवं स्वादिष्ट होते हैं। यह कम पानी में भी अच्छी उपज देता है। इसकी उपज क्षमता 78 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। केंद्र सरकार ने इस प्रभेद को नोटिफाइड कर दिया है। धान का सुधा प्रभेद : अनुसंधान परिषद की बैठक में डेल्टा कंपनी द्वारा मध्यम जमीन में अच्छी उपज देने वाले सुधा प्रभेद की भी चर्चा की गई। इसके एरिया सेल्स मैनेजर मंगेश कुमार का बताना है कि मध्यम मोटा दाने वाले इस प्रभेद की उपज क्षमता 32 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है एवं 130 दिन से 135 दिन में तैयार होता है।

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस पर अभी और चितन मंथन करने के बाद अनुशंसित करने का फैसला लिया है। फसल प्रबंधन पर लिखित बुलेटिन का भी विमोचन विश्वविद्यालय के विज्ञानी डॉ. नीलंजय द्वारा लिखित गिनी घास, जई घास, घास चावल गेहूं मक्का या आदि फसल प्रबंधन पर लिखित बुलेटिन का भी विमोचन कुलपति द्वारा इस मौके पर किया गया। मौके पर निदेशक अनुसंधान डॉ. मिथिलेश कुमार द्वारा विश्वविद्यालय में चल रहे भारत सरकार एवं बिहार सरकार सहित अन्य संस्थानों के विभिन्न प्रोजेक्ट के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा की। बिहार सरकार द्वारा जलवायु परिवर्तन के अनुसार कृषि कार्यक्रम से संबंधित अनुसंधान परियोजना जो आठ जिलों में विश्वविद्यालय द्वारा संचालित है, इसके संबंध में भी विस्तारपूर्वक चर्चा की गई। मशरूम उत्पादन को लेकर ऑनलाइन प्रशिक्षण की सहित अन्य कारणों पर विस्तारपूर्वक वैज्ञानिकों के बीच चर्चा हुई। मौके पर गृह विज्ञान अधिष्ठाता डॉ. मीरा सिंह, प्रसार शिक्षा निदेशक एमएस कांडू, डॉ. मृत्युंजय कुमार, डॉ. मिथिलेश कुमार, डॉ. एसबी मिश्रा, डॉ. रमेशचंद्र, डॉ. आइपी पांडेय सहित दर्जनों डीन, अधिष्ठाता एवं विज्ञानी मौजूद थे।

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