Jivitputrika Vrat 2020
धर्म

Jivitputrika vrat: नहाय-खाय के साथ सप्तमी पर शुरू होगा जिउतिया व्रत, नवमी तिथि को होगा पारण

संतान की सुरक्षा, स्वास्थ्य, दीर्घायु, समृद्धि की मंगल कामना को पूर्ण करने वाला  लोकपर्व है जीवित्पुत्रिका व्रत।  आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन जीवित्पुत्रिका का व्रत किया जाता है। यह व्रत 10 सितंबर गुरुवार को है। इस व्रत को महिलाएं अपनी संतान को कष्टों से बचाने और उनकी लंबी आयु की मनोकामना की पूर्ति के लिए करती हैं। इस व्रत को निर्जला किया जाता है। कुछ जगहों पर इसे जितिया या जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। 

व्रत की कई पौराणिक कथायें हैं-उसी में एक कथा है कि जब महाभारत का युद्ध हुआ तो अश्वत्थामा नाम का हाथी मारा गया। लेकिन चारों तरफ यह खबर फैल गई कि अश्वत्थामा मारा गया। यह सुनकर अश्वत्थामा के पिता द्रोणाचार्य ने शोक में अस्त्र डाल दिए। तब द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया। इसके कारण प्रतिशोध के लिए अश्वत्थामा ने रात्रि के अंधेरे में पांडव समझकर उनके पांच पुत्रों की हत्या कर दी। इसके कारण पांडवों को अत्यधिक क्रोध आ गया, तब भगवान श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा से उसकी मणि छीन ली। जिसके बाद अश्वत्थामा पांडवों से क्रोधित हो गया और उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को भी जान से मारने के लिए उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। भगवान श्री कृष्ण इस बात से भली-भांति परिचित थे कि ब्रह्मास्त्र को रोक पाना असंभव है। अत: भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल एकत्रित करके उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को दिया। इसके फलस्वरूप गर्भ में पल रहा शिशु पुनर्जीवित हो गया, जो बड़ा होकर राजा परीक्षित बना। उत्तरा के बच्चे के दोबारा जीवित हो जाने के कारण ही इस व्रत का नाम जीवित्पुत्रिका व्रत पड़ा। तब से ही संतान की लंबी उम्र और स्वास्थ्य की कामना के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत किया जाता है। एक दूसरी कथा राजा जीमुतवाहन की भी कही जाती है। 

यह व्रत आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि से आरंभ होकर नवमी तक होता है। व्रत का आरंभ सप्तमी तिथि को भोजन ग्रहण से शुरू किया जाता है, जिसे लोकभाषा में नहाय-खाय कहते हैं और अष्टमी के दिन पूरे दिन निर्जला उपवास रख कर नवमी तिथि को फिर उसी प्रकार सात्विक भोजन के साथ इसका पारण किया जाता है। 
    व्रत में माता पार्वती की आराधना की जाती है। साथ में उनके पुत्र गजानन की पूजा का भी विधान है। ऐसा माना जाता है कि जो मांएं सच्ची श्रद्धा के साथ माता पार्वती, गणेश जी और जीमुतवाहन की पूजा करती हैं, उनकी संतान को कभी कोई विघ्न बाधा नहीं आती और वह दीर्घायु, स्वस्थ रहती है।

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Kunal Raj
Editor-In-Chief l Software Engineer l Digital Marketer