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ITR भरने से पहले जान लें जरूरी बातें ताकि न हो आपका नुकसान

आयकर विभाग ने 2019-20 (असेसमेंट ईयर 2020-21) के लिए इनकम टैक्स रिटर्न करने आखिरी तारीख 31 दिसंबर कर दिया है।  आपको ITR भरते समय न तो कोई दस्तावेज जमा करना होता है और न ही कोई दस्तावेज अपलोड करना होता है। आपको सिर्फ रिटर्न में मांगी गई जानकारी को सही भरना होता है। अगर आपने अब तक अपना रिर्टन फाइल नहीं किया है तो इन बेसिक टर्म्स को जान लें ताकि कोई गलती न हो…

वित्तीय वर्ष 

एक अप्रैल से 31 मार्च तक के समय को फाइनेंशिल इयर कहते हैं। उदाहरण के लिए 1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2020 तक की अवधि को वित्तीय वर्ष या फाइनेंशिल इयर 2019-20 कहा जाएगा। इस बार हम जो रिटर्न भर रहे हैं, वो फाइनेंशिल इयर 2019-20 के लिए है।

करदाता कौन?

करदाता का मतलब ऐसे व्यक्ति से है, जो आयकर विभाग को राशि (ब्याज दंड आदि) देने के लिए उत्तरदायी है। आयकर अधिनियम की धारा 2(7) के अनुसार ऐसा व्यक्ति करदाता कहलाता है।

एसेसमेंट ईयर

इनकम टैक्स रिटर्न एक अप्रैल से शुरू होकर अगले साल 31 मार्च तक कमाई का हिसाब आप से लेता है। फाइनेंशियल ईयर में कमाई का टैक्स अगले फाइनेंशियल ईयर में लिया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो जिस साल आप कमाई करते हैं वह फाइनेंशियल ईयर कहलाता है, उसके अगले साल जब आप टैक्स भरते हैं तो वह उस साल के लिए एसेसमेंट ईयर कहलाता है।

फॉर्म 16ए

अगर आप कहीं नौकरी करते हैं तो आपका एम्प्लॉयर आपको एक फॉर्म 16 देता है। यह फॉर्म अब तक आपके एम्प्लॉयर ने आपको दे दिया होगा। फार्म 16 A के अंतर्गत करदाता को सैलरी के अलावा अगर दूसरे स्रोतों से आमदनी हुई है और उस पर टीडीएस कट चुका हो तो उस संस्था से भी टीडीएस सर्टिफिकेट लेना चाहिए। इस सर्टिफिकेट को ही फॉर्म 16ए कहा जाता है।

डिडक्शन

कई तरह के निवेश और खर्च पर इनकम टैक्स विभाग आयकर नियमों के तहत आपको टैक्स छूट देता है। आप जो निवेश करते हैं, उसके आधार पर टैक्स छूट का दावा करते हैं। इस पर विभाग आपको टैक्स रिफंड करता है। टैक्स में मिलने वाली छूट डिडक्शन कहलाती है।

ग्रॉस इनकम

ग्रॉस इनकम करदाता की टैक्स-फ्री आमदनी और अलाउंसेस को घटाने के बाद साल की कुल आय को ग्रॉस इनकम कहा जाता है। ग्रॉस इनकम हमेशा 80C से 80U तक मिलने वाले डिडक्शन से पहले वाली इनकम होती है।

टैक्सेबल इनकम या कर योग्य आय

ग्रॉस इनकम में आयकर की धारा 80C से 80U तक मिलने वाली टैक्स छूट लेने के बाद जो इनकम आती है, उसे टैक्सेबल इनकम या कर योग्य आय कहते हैं। मतलब डिडक्शन से पहले वाली इनकम ग्रॉस इनकम और डिडक्शन के बाद वाली इनकम को टैक्सेबल इनकम कहलाती है।

टीडीएस

आपकी आमदनी पर सरकार टैक्स काटती है। इसे टैक्स डिडक्टेड ऐट सोर्स कहते हैं। टैक्स की रकम काटकर कंपनी बाकी रकम आपको सैलरी में देती है। जितना टैक्स काटा है, उसे आपके रिकार्ड समेत आयकर विभाग के खाते में जमा करती है।  टीडीएस काटने का काम एम्प्लॉयर या पेमेंट करने वाली संस्था का है। इसे काटना या जमा करना लेने वाले की जिम्मेदारी नहीं है।

टैक्स रिफंड

अगर किसी टैक्सपेयर का सरकार ज्यादा टैक्स काट लिया है तो वह वापस लेने के लिए निवेश के दावे करता है। अगर विभाग के पास करदाता का पैसा है तो उसे विभाग पैसे वापस कर देता है। जिसको टैक्स रिफंड कहते हैं। यह राशि करदाता के खाते में आती है।
 

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