Bihar Election 2020
बिहार विधानसभा चुनाव 2020

2015 विधानसभा चुनाव की तरह कहीं इस बार तो सीटों को लेकर नहीं फंसेगा पेंच? जानें क्या कहते हैं चुनावी समीकरण

एनडीए में खासतौर से लोजपा की बात करें तो वह इस बार के लोकसभा चुनाव में भी अपने कोटे की सीटों को लेकर अड़ गयी थी। उसे मनाने के लिए जदयू-भाजपा को दूसरा रास्ता अपनाना पड़ा था। लोजपा के तत्कालीन अध्यक्ष को उच्च सदन पहुंचाने का भरोसा देने के बाद मामला बना। हालांकि पहले समता पार्टी और फिर आगे चलकर जब जदयू-भाजपा के बीच गठबंधन रहा तो सीटों के बंटवारे में कहीं कोई पेच बाहरी तौर पर नहीं उभरा। लेकिन, 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 के विधानसभा चुनाव में जब जदयू एनडीए से अलग चुनाव में उतरा तो सीटों का बंटवारा कई छोटे दलों के साथ कई तरह के उलझाव लेकर उभरा। वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव में एनडीए में भाजपा, लोजपा और रालोसपा थी। तब पहली बार रालोसपा लोकसभा लड़ रही थी। इसे 3, लोजपा को 7 सीटें देकर भाजपा ने खुद 30 प्रत्याशी दिए थे। रालोसपा ने तब लोजपा को उससे दोगुनी से अधिक सीटें देने पर एतराज जताया था। 

वहीं, 2015 के विधानसभा चुनाव में एनडीए में चार दल शामिल थे। भाजपा के साथ रालोसपा, लोजपा और जीतन राम मांझी की पार्टी हम भी जुड़ गयी थी। हम और रालोसपा की ओर से लगातार कई दिनों तक कई प्रकार के दावे सीटों को लेकर सामने आते रहे। रालोसपा 60 सीटों की मांग पर अड़ी थी। वैशाली में सभा करके उसने 40 सीटों से कम पर समझौता नहीं करने का एलान कर दिया। बहुत ही मान-मनौव्वल के बाद भाजपा ने 157, आरएलएसपी ने 23, हम ने 21 और एलजेपी ने 42 लड़ाके मैदान में उतारे। इनमें भाजपा को 53, रालोसपा को 2, हम को 1 और लोजपा को 2 सीटों पर जीत मिली।  

लोग पिछले साल हुए 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं भूले हैं। तब जदयू 2009 के बाद लोस चुनाव में भाजपा के साथ उतरा था। लोजपा पहले से उसके साथ थी। एनडीए गठबंधन में 2014 में लोजपा को 7 सीटें मिली थीं, वह इतने से कम पर राजी नहीं हो रही थी। तब मामला इसलिए फंस गया था कि 7वीं सीट के रूप में जिस नालंदा सीट की मांग लोजपा कर रही थी, वह जदयू की सीटिंग सीट थी। सीट बंटवारे पर अड़ी लोजपा तब मानी जब तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष रामविलास पासवान को राज्यसभा भेजने का वादा किया गया। 

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Kunal Raj
Editor-In-Chief l Software Engineer l Digital Marketer