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‘लॉकडाउन दोबारा भीख मांगने पर मजबूर कर देगा’

“क्या फिर से लॉकडाउन लगाया जाएगा?”

पिछले हफ़्ते मुंबई में अपने छोटे से कमरे में बैठे सेठी बंधु जब मुझसे वीडियो कॉल पर बात कर रहे थे तो उनकी आवाज़ में बेचैनी साफ़ तौर पर महसूस हो रही थी. ख़राब इंटरनेट कनेक्शन के बीच कांपती आवाज़ में वे यही सवाल बार-बार पूछ रहे थे.

इस बात को एक दशक से ज़्यादा अरसा हो गया जब संतोष और टुन्ना सेठी ओडिशा में अपना घर-परिवार छोड़कर काम की तलाश में निकले थे. उन्हें अपने घर से 1600 किलोमीटर दूर मुंबई में जाकर ठिकाना मिला.

शहर की गगनचुंबी इमारतों के साये तले संतोष और टुन्ना यहां अपना पसीना बहाते हैं. ये इमारतें बाहर से आए इनके जैसे मजदूरों ने ही दौलतमंद लोगों के लिए बनाई हैं.

सिर पर सीमेंट, रेत, ईंट और पत्थर ढोने के बाद वे हर रोज़ आठ घंटे की दिहाड़ी में 450 रुपये कमाते हैं. निर्माणाधीन इमारतों में उनकी रातें गुजरती हैं, उनका रहना खाना-पीना वहीं होता है. अपनी बचत का बड़ा हिस्सा वे अपने घर भेज देते हैं.

‘इंडिया मूविंग: अ हिस्ट्री ऑफ़ माइग्रेशन’ किताब के लेखक चिन्मय तुंबे के अनुसार, भारत में 45 करोड़ से भी ज़्यादा लोग एक जगह से दूसरी जगह पर जाकर काम करते हैं. उनमें छह करोड़ लोग अपना राज्य छोड़कर दूसरे राज्य में जाकर मजदूरी करते हैं.

प्रोफ़ेसर तुंबे बताते हैं, “भारत के शहरों की उभरती हुई ‘इन्फॉर्मल इकॉनमी’ की रीढ़ यही मजदूर हैं. देश के सकल घरेलू उत्पाद में दस फीसदी का योगदान करने के बावजूद ये तबका सामाजिक और राजनीतिक रूप से जोख़िम की स्थिति में है.”

‘इन्फॉर्मल इकॉनमी’ किसी देश की अर्थव्यवस्था का वो हिस्सा होता है, जहां ज़्यादातर भुगतान नकद में किया जाता है और जिससे सरकार टैक्स वसूल नहीं पाती है.

उधर, मुंबई में डर का आलम बुरी तरह से छाया हुआ है. सेठी बंधु भी इसी के साथ जी रहे हैं. वे पूछते हैं, “क्या हमें घर वापस लौटना होगा? क्या आपके पास कोई जानकारी है?”

महाराष्ट्र में अब तक कोरोना संक्रमण के 30 लाख से भी ज़्यादा मामले रिपोर्ट हो चुके हैं. लगता है कि जैसे राज्य की राजधानी मुंबई इस बात पर अड़ी हुई है कि भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर का केंद्र भी उसे ही बनना है.

राज्य सरकार ने कई बार ये चेतावनी दे दी थी कि अगर संक्रमण के मामले कम न हुए तो पूर्ण लॉकडाउन लगाया जा सकता है.

मंगलवार को वही हुआ. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की सरकार ने कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिए नई पाबंदियां लागू कर दीं.

हालांकि राज्य सरकार ने अनिवार्य सेवाओं और यात्राओं को जारी रखने की छूट दी है और निर्माण गतिविधियों पर भी कोई रोक नहीं लगाई गई है. यानी इस सेक्टर में सेठी बंधु जैसे मजदूरों को फिलहाल काम मिलता रहेगा और वे निर्माण स्थल पर ही रह सकेंगे.

भारत में पिछले साल व्यापक रूप से लॉकडाउन लगाया था. ऐसा लगा कि उसकी योजना ठीक से नहीं बनाई गई थी. इसके कारण एक करोड़ से ज़्यादा मजदूरों को बड़े शहरों से पलायन करके अपने घर वापस लौटना पड़ा था.

फटेहाल मजदूर, जिनमें औरत और मर्द दोनों ही थे, पैदल ही, साइकिलों पर, ट्रकों पर और बाद में ट्रेन से निकल पड़े. नौ सौ से ज़्यादा लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया. इनमें से 96 लोगों ने तो ट्रेन में दम तोड़ दिया.

लॉकडाउन के दौरान हुए मजदूरों के पलायन ने साल 1947 के रक्तरंजित बंटवारे के दौरान शरणार्थी बनने पर मजबूर लाखों लोगों की याद दिला दी.

मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर की राय में “शायद ये अभूतपूर्व मानवीय संकट था जो बहुत से भारतीयों ने अपने जीवनकाल में देखा होगा.”

मुंबई एक बार फिर से लुटी हुई दिख रही है और सेठी बंधु एक तरफ़ कुआं तो दूसरी तरफ़ खाई की स्थिति में हैं.

पिछले साल के लॉकडाउन की डरावनी यादें उनका पीछा कर रही हैं. रोज़ी-रोटी और आने-जाने के साधन बंद हो जाने के कारण पिछले साल वे दो महीने तक इसी शहर में फंसे रह गए थे और आख़िरकार उन्हें भीख मांगकर गुजारा करना पड़ा था.

संतोष सेठी की उम्र 43 साल हो गई है. वे बताते हैं, “वो यकीनन एक बुरा अनुभव था. एक ख़राब दौर था.”

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