Durga Pooja 2020
धर्म

Navratri 2020: आत्मबल की आराधना का पर्व नवरात्रि, इन बीज मंत्रों के माध्यम से देवी की आराधना

नवरात्रि यानी आत्म-चिंतन और प्रकृति से एकाकार होने का एक पावन समय है। इस पर्व के पीछे हमारी सनातन परंपरा, सजगता और ऋतु जनित व्याधियों से लड़ने की तैयारी भी छिपी है। ऋतु परिवर्तन होने पर शरीर का आत्मबल कमजोर पड़ जाता है। ऐसे में नवरात्रि के रूप में हमको यह संदेश दिया जाता है कि नौ दिन तक अपने को ऋतु के मुताबिक तैयार करो। व्याधियों से लड़ने के लिए शारीरिक अनुशासन का पालन करो। इसलिए, हर ऋतुकाल में नवरात्रि के नौ दिन शारीरिक अनुशासन का संदेश लेकर आते हैं।

हर प्राणी के कुछ बल कहे गए हैं। मनुष्य के बलों में तीन बल आते हैं- विद्या, बुद्धि और विवेक। जिसके पास ये तीनों बल हों, उसमें आत्म-विश्वास की कमी नहीं होती और न ही उसका आत्मबल कमजोर पड़ता है। इसी प्रकार से तीन शोधन भी हैं। मनुष्य के लिए यह तीन शोधन- वात, पित्त और कफ  हैं यानी शारीरिक दृष्टि से अपने को मजबूत करना। धन का स्थान बाद में आता है, पहले तन और मन के प्रकाश की कामना की गई है। और देवी भगवती की आराधना का पहला मूल मंत्र ही यही है बल प्राप्त करना और शरीर का शोधन करना। जिसने इसे प्राप्त कर लिया, उसका जीवन आलोकित हो गया।  मन की दो अवस्थाएं होती हैं। वह माया-मोह में पड़ता है या फिर नकारात्मक ऊर्जा की ओर जाता है। देवी कहती भी हैं, मन सबके पास होता है, हर जीव-जंतु अपना भला-बुरा सोचता है, लेकिन उसको यह नहीं पता होता कि कब क्या करना है। विवेक की पूंजी तो केवल मनुष्य के पास है, और किसी के पास नहीं। यही समझाने के लिए देवी भगवती नवरात्रि में नौ रूपों में आती हैं। प्रकृति से लेकर अंश-वंश तक का समस्त अर्थशास्त्र समझाती हैं।

देवी भगवती, महालक्ष्मी के रूप में सौभाग्य प्रदान करती हैं, काली के रूप में सृष्टि में अनुशासन रखती हैं और सरस्वती के रूप में शब्द-सुर संसार का संचालन करती हैं। देवी का पहला स्वरूप शैलपुत्री है और दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का। नवां स्वरूप सिद्धिदात्री यानी लक्ष्मी का है। यह क्रम बदल भी सकता था, लेकिन देवी ने सबसे पहले अपना स्वरूप प्रकृति और फिर प्रवृत्ति रखा। धन का स्थान अंत में है। नवरात्रि भी प्रकृति का ही उत्सव है। संकेत साफ है- प्रकृति बिगड़ी तो आपदा या महामारी निश्चित है। देवी भले ही एक स्त्री के रूप में परिभाषित हों, लेकिन वह आत्मबल हैं। वह आद्या हैं। देवी शास्त्रों में उनके तीन बल कहे गए हैं- सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण। देवी वस्तुत: आपदा की देवी हैं। जब सृष्टि में महामारी फैली, आपदा आई तो देवी भगवती ने जन्म लिया। फिर चाहे वह शाकुंभरी बनकर आई हों या शताक्षी बनकर या पीताबंरा के रूप में। ऐसे में तमाम महामारी और व्याधियों को जीतने का एक ही मंत्र है-आत्मबल। कोरोना काल से बढ़ कर उदाहरण और क्या हो सकता है। देवी आराधना आत्मबल की प्रतीक हैं। श्री दुर्गा सप्तशती का प्रारम्भ ही कवच से होता है। 

यह तन-मन का संदेशात्मक कवच है। विभिन्न देवियां शारीरिक अंगों की शक्ति हैं। समग्र रूप से यह शक्तियां दुर्गा या भवानी का रूप लेती हैं, जिसे शरीर कहा जाता है। शरीर के समस्त अवयवों की शक्तियां ही ऋतु-व्याधियों से लड़ती हैं। अर्गलास्तोत्र में, देवी काली से प्रार्थना होती है कि वह जगत का कल्याण करें। इसमें भी आरोग्यता प्रथम है। कीलकम् गुप्त है। यह मानसिक तप है। जप है।


’   देवी पूजा का एक क्रम बताया गया है, जैसे गुरु, गणपति, शिव, दुर्गा ( देवी क्रमों में पहले पार्वती, फिर महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी), नारायण भगवान और अंत में नवग्रह शांति।
’   देवी कवच, अर्गलास्तोत्र व कीलकम का खाली पाठ न करें। साथ में दुर्गा सप्तशती का पांचवां, आठवां,सप्तश्लोकी दुर्गा या सिद्धकुंजिका का पाठ करें। सिर्फ अर्गलास्तोत्र का पाठ कर सकते हैं, पर कवच व कीलक के साथ एक पाठ अतिरिक्त करना होगा।
’   एक मंत्र ही नौ दिन जप करें। नौ दिन तीन काल-तीन सिद्धकुंजिका स्तोत्र के पाठ से नौ देवियों, दश महाविद्या व षोड्श माताओं की पूजा एक साथ हो जाएगी। 

धारण करें देवी के बीज मंत्रों की ऊर्जा 
श्री दुर्गा सप्तशती सात सौ श्लोकों का ग्रंथ है। यह केवल देवी चरित नहीं है। इसमें चार तत्व शोधन यानी चिकित्सा भी हैं।
ऊं ऐं आत्मतत्वं शोधयामि
ऊं ह्रीं विद्यातत्वं शोधयामि
ऊं क्लीं शिवतत्वं शोधयामि
ऊं ह्रीं क्लीं सर्वतत्वं शोधयामि
इसके मूल में बीज मंत्र हैं। हर बीज मंत्र की अपार शक्ति है। पूरी दुर्गा सप्तशती में सवा सौ से भी अधिक बीज मंत्र हैं। प्रसिद्ध बीजमंत्र ‘ऊं ऐं ह्रीं क्लीं’ हैं। यह बीज मंत्र हमारे शरीर के तीन अवयव मन-बुद्धि-विवेक को नियंत्रित करता है। हर मंत्र की स्तंभन शक्ति है, जो शरीर को स्वस्थ रखने का कार्य करती है। 
नवरात्रि में बीज मंत्रों से भी पूजा हो सकती है। यदि  विधि-विधान से पूजा करने का अवसर नहीं मिले, तो बीज मंत्रों के माध्यम से देवी की आराधना हो सकती है। ये समस्त बीज मंत्र आत्मबल वृद्धिकारक और शोधन के हैं। कुछ बीज मंत्र इस प्रकार हैं- ऊंदुं दुर्गायै नम:, ऊं श्रीं क्लीं ह्रीं, ऊं श्रीं श्रीं क्लीं हंू, ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे, भ्रां भ्रीं भ्रूं आदि। इनमें से किसी भी एक मंत्र को सामर्थ्य के अनुसार पढ़ा जा सकता है।

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