बिहार

चंदा बाबू की कहानी: अकेले दम पर शहाबुद्दीन को सलाखों की पीछे पहुंचाया

चंदा बाबू उर्फ चंद्रकेश्वर प्रसाद नहीं रहे। पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे चंदा बाबू का बुधवार को सीवान में हार्ट अटैक की वजह से निधन हो गया। मरने के बाद भी चंदा बाबू बिहार में जंगलराज और सड़े हुए सिस्टम के खिलाफ अकेले आवाज बुलंद करने के लिए याद किए जाएंगे। वह इसलिए भी याद किए जाएंगे कि आज से डेढ़ दशक पहले जब पुलिस-प्रशासन सीवान के तत्कालीन बाहुबली सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के डर से थर्र-थर्र कांप रहा था, तब उन्होंने अकेले उसका मुकाबला किया और लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर उसे सलाखों के पीछे पहुंचाया। चंदा बाबू इसलिए भी याद किए जाएंगे कि उन्होंने अपने तीन-तीन जवान बेटों की अर्थी को कंधा दिया, पर सड़े हुए सिस्टम और उससे पैदा हुए नेता की खाल ओढ़े एक बाहुबली के आगे हार नहीं मानी।

16 अगस्त, 2004 की काली सुबह
बात 2004 के अगस्त महीने की है। सीवान में दो दुकानों के मालिक चंदा बाबू को दो लाख रुपए की रंगदारी के लिए फोन आ रहे थे। जिनके जेहन में साल 2005 से पहले का बिहार जिंदा है, उन्हें मालूम है कि रंगदारी राज्य के चौक-चौराहों पर सबसे ज्यादा प्रचलितों शब्दों में शुमार था। खैर, अभी चंदा बाबू के संघर्ष की कहानी को आगे बढ़ाते हैं। चंदा बाबू रंगदारी के उन फोन कॉल्स को इग्नोर रहे थे। इस बीच किसी काम से वह पटना निकल गए अपने भाई के पास, जो रिजर्व बैंक में अधिकारी थे।

देश की आजादी की वर्षगांठ के अगले दिन यानी 16 अगस्त 2004 को चंदा बाबू के किराने की दुकान पर डालडा उतारने के लिए गाड़ी रुकी हुई थी और गल्ले में डालडे वाले को देने के लिए ढाई लाख रुपए पड़े थे। दुकान पर चंदा बाबू का बेटा सतीश था। उसी दौरान रंगादारी मांगने वाले गुंडे हथियारों के साथ आ धमके। सतीश ने कहा कि खर्चे के लिए 30-40 हजार रुपए दे सकता है, दो लाख रुपए उसके पास नहीं है। गुंडों ने सतीश की पिटाई की और गल्ले में रखे ढाई लाख रुपए निकाल लिए। छोटे भाई राजीव ने जब सतीश को गुंडों के हाथों मार खाते देखा, तो उसे बचाने के लिए बाथरूम साफ करने के लिए रखी एसिड को मग में डालकर उनकी ओर फेंका। बताया जाता है एसिड के कुछ छींटे गुंडों पर पड़ गए।

भाइयों के साथ हो रही वारदात की बात थोड़ी ही दूरी पर दूसरी दुकान में गिरीश तक पहुंचती है और आनन-फानन में वह भी इस दुकान पर पहुंच जाता है। गुंडों ने राजीव को एक खंभे में बांध दिया और उसके सामने सतीश व गिरीश को तेजाब से नहला दिया। दोनों भाइयों को तेजाब से झुलसा कर मारने के बाद उनके शवों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए और बोरियों में नमक के साथ भरकर फेंक दिया गया। इसी दौरान उनकी दुकान भी लूटने के बाद आग के हवाले की जा चुकी थी।

वहशियों ने राजीव को इससे भी हौलनाक मौत देने की बात कही और उसे उठाकर अपने साथ ले गए। पटना में मौजूद चंदा बाबू तक अपने दोनों बेटों के मारे जाने, एक बेटे के अपहरण और दुकान बर्बाद होने की कहानी पहुंची। यह भी बताया गया कि राजीव पटना में था और छत से गिरने की वजह से अस्पताल में भर्ती है। हालांकि, असल में राजीव गुंडों के कब्जे से भागकर छिपते-छिपाते यूपी पहुंच चुके थे। चंदा बाबू को भनक लग गई कि राजीव के पटना के अस्पताल में भर्ती होने की बात झूठी है और उन्हें वहां बुलाकर मारने का प्लान है। इस बीच चंदा बाबू की पत्नी कलावती की शिकायत पर सीवान के थाने में हत्या और अपहरण का मामला दर्ज हो गया।

बुजुर्ग चंदा बाबू का संघर्ष
चंदा बाबू को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। भारी मन से उन्होंने फैसला किया कि वह सीवान जाएंगे और शहाबुद्दीन के आतंक के साम्राज्य को चुनौती देंगे। शुभचिंतकों ने चंदा बाबू को बार-बार कहा कि सीवान न आएं, नहीं तो उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया जाएगा। लेकिन, उनका इरादा टस से मस नहीं हुआ। हिम्मत जुटाकर वह सीवान पहुंचते हैं और जिले के पुलिस अधीक्षक से मिलने की कोशिश करते हैं, पर यह संभव नहीं हो पाता है। थाने में दारोगा से मुलाकात होती है, तो वह चंदा बाबू को अंदर ले जाकर समझाते हैं कि कहीं भी चले जाइए, लेकिन सीवान में मत रहिए।

इस दौरान छोटे बेटे राजीव के बारे में चंदा बाबू को कोई खबर नहीं थी कि वह जिंदा भी है या मर गया। सीवान में पत्नी कलावती के साथ रह रहे विकलांग बेटे और दो बेटियों की सुध भी नहीं ले पाए। पुलिस-प्रशासन से कोई समर्थन नहीं मिलने के बाद चंदा बाबू पटना पहुंच गए और सत्ताधारी पार्टी के नेताओं से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। थककर वह दिल्ली में पहुंचे और वहां भी उन्होंने केंद्र में सताधारी पार्टी के नेताओं से मदद मांगी, लेकिन शहाबुद्दीन का रसूख ऐसा था कि किसी ने उनकी फरियाद नहीं सुनी।

सीवान से दिल्ली तक धक्के खाने के बाद चंदा बाबू को एक बात समझ में आ गई थी कि यह उनकी अकेले की लड़ाई है और इसमें सिस्टम उनके साथ नहीं, खिलाफ है। उन्होंने तय किया कि अब चाहे जान ही क्यों न चली जाए, सीवान में ही रहेंगे और वहीं से लड़ाई लड़ेंगे। समय का चक्र घूमा और वर्ष 2005 में नीतीश कुमार सत्ता में आए। नीतीश सरकार ने शहाबुद्दीन पर कार्रवाई शुरू की। इसी दौरान राजीव की शादी होती है और दोनों बेटों की हत्या के केस में अदालती कार्यवाही शुरू होती है। राजीव तेजाब हत्याकांड का चश्मदीद गवाह था। उसकी गवाही से तीन दिन पहले शहर के डीएवी मोड़ पर 16 जून 2014 को गोली मारकर उसकी हत्या कर दी गई। राजीव की शादी के महज 18 दिन हुए थे।

‘भगवान मार दे या शहाबुद्दीन’
राजीव की हत्या के दो साल बाद जब शहाबुद्दीन को इस दोहरे हत्याकांड में जमानत मिल गई तो चंदा बाबू टूट गए थे और सबकुछ भगवान के भरोसे छोड़ दिया। उन्होंने उस समय कहा था, ‘ऐसी बातों से अब दुख नहीं होता। अब मैं इसे हार-जीत के रूप में नहीं देखता क्योंकि जिंदगी में सब कुछ और सब जगह हार चुका हूं। राजीव की हत्या के दिन ही तय हो गया था कि शहाबुद्दीन को जमानत मिल जाएगी। भाइयों के हत्यारे का राजीव ही एक मात्र चश्मदीद गवाह था। अब मेरे लिए मायने नहीं रखती कि हत्या के मामले में क्या होगा या क्या हो रहा है। अब सिर्फ एक मात्र चिंता अपने विकलांग बेटे और बीमार पत्नी की है। पत्नी 65 साल की हो गई है और मैं 70 का।’ उन्होंने कहा, ‘तीन बॉडीगार्ड मिले हैं, लेकिन बॉडीगार्ड का क्या भरोसा। हम छुपकर भी कहां जाएंगे। मरना तो है ही एक दिन। अब हमें भगवान मार दे या शहाबुद्दीन।’

इतने जुल्मो-सितम के बाद भी चंदा बाबू व उनकी पत्नी अपने एक अपाहिज बेटे के साथ सीवान में डटे रहे और शहाबुद्दीन को सलाखों के पीछे पहुंचा कर ही दम लिया। पिछले साल कलावती ने भी चंदा बाबू का साथ छोड़ दिया। इसके बाद विकलांग बेटा और राजीव की विधवा ही उनकी जिंदगी का सहारा रह गए थे। पत्नी के साथ छोड़ने के बाद चंदा बाबू अक्सर बीमार रहने लगे। लंबी बीमारी के बाद 16 दिसंबर 2020 को हार्ट अटैक से उनकी भी मौत हो गई।

Share This Post