उत्तर प्रदेश

जिस केस में विकास दुबे हुआ था बरी, उससे जुड़ीं फाइलें गायब

भले ही विकास दुबे एनकाउंटर में मारा गया हो लेकिन उससे जुड़ी हर कड़ी का राज एसटीएफ जानना चाहती है। इसके लिए विकास दुबे से जुड़े हर पुराने मामलों की भी तहकीकात की जा रही है। 2004 में कानपुर में हुए केबिल ऑपरेटर हत्याकांड में विकास दुबे का भी नाम आया था, अब जांच में पता चला कि उस केस से जुड़ी फाइलें गायब हो गई हैं। हालांकि उस केस में वह बरी हाे गया था। फाइल गायब होने की जानकारी मिलते ही पुलिस की धड़कनें बढ़ गई हैं। इस मामले में एसआईटी और न्यायिक जांच आयोग दोनों ने ही रिपोर्ट मांगी है पर फाइल का कुछ पता नहीं है।  जांच करने वाली टीमें जानकारी करना चाहती हैं कि आखिर ऐसा कैसे हुआ था।

सन 2004 में बर्रा 2 निवासी केबिल ऑपरेटर दिनेश दुबे की हत्या कर दी गई थी। घटना को बर्रा 7 में अंजाम दिया गया था। इस मामले में विकास दुबे समेत चार लोग आरोपित थे। जिसमें दो सगे भाइयों को आजीवन कारावास की सजा हुई थी। विकास दुबे इस केस से बरी हो गया था। बिकरू की घटना के बाद पुलिस द्वारा विकास के सभी केस दोबारा खोलने और उनमें फिर से जांच करने का निर्णय लिया गया। इसी दौरान एसआईटी और न्यायिक जांच आयोग ने भी केबिल ऑपरेटर हत्याकांड की फाइल तलब कर ली। बर्रा इंस्पेक्टर हरप्रीत सिंह ने बताया कि अभियोजन कक्ष से फाइल गायब हो गई है। वहीं थाने में भी फाइल के बारे में जानकारी नहीं हो पाई है। वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी सूचना दे दी गई है। 

बेनामी खातों की जांच में लगी एसटीएफ
बिकरू कांड के मुख्य आरोपित विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद प्रतिदिन उसे लेकर नई सूचनाएं पुलिस और एसटीएफ के पास पहुंच रही है। हाल में एसटीएफ को विकास दुबे के दो बेनामी खातों के बारे में जानकारी मिली है। जिसे वह भुगतान करने में इस्तेमाल करता था। दोनों खाते फेक आईडी से खोले गए हैं। विकास दुबे के सम्पर्क में कंट्री मेड पिस्टल बनाने वाले गिरोह थे। जो उसे माल सप्लाई करते थे। कुछ लोगों को खातों में सीधे पैसे भेजने की नौबत रहती थी। उन्हीं खातों में पैसा भेजने के लिए विकास दोनों खातों का प्रयोग करता था। दोनों खाते फर्जी आईडी से खुलवाए गए थे। हस्ताक्षर विकास दुबे द्वारा ही किए जाते थे। इन दोनों खातों से 40 हजार रुपए तक का भुगतान सीधे दूसरे खाते में भेज दिया जाता था। 

एटीएम कार्ड भी
दोनों खातों के एटीएम कार्ड भी जारी थे। विकास इन दोनों खातों का इतनी सावधानी से इस्तेमाल करता था ताकि वह किसी सरकारी मुलाजिम की नजरों में न आ जाए। उस खाते में हमेशा इतनी ही रकम रखी जाती थी, जो जरूरी हो। उसमें पैसा जमा कराने के लिए अलग अलग दो- तीन लोग बैंक जाते थे और 15-20 हजार रुपए से ज्यादा एक बार में जमा नहीं कराया जाता था। 

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