Khasrmas
धर्म

खरमास के दौरान क्या करना होता है शुभ और अशुभ, जानिए इस महीने का महत्व

खरमास का महीना 15 दिसंबर से शुरू हो चुका है। इस महीने में किसी भी तरह का कोई शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है। यह 14 जनवरी 2020 को समाप्त होगा। तीर्थ यात्रा के लिए खरमास के महीने को बेहद शुभ माना जाता है। शास्त्रों में वर्णित है कि आखिर खरमास के दौरान क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

खरमास के दौरान क्या करें- 

 कहते हैं कि खरमास के दौरान सूर्यदेव की उपासना करनी चाहिए। मान्यता है कि सूर्य भगवान के आशीर्वाद से तरक्की और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

 खरमास में भगवान विष्णु की पूजा करना लाभकारी होता है। कहते हैं कि ऐसा करने से घर में मां लक्ष्मी का घर में आगमन होता है।

खरमास के दौरान ब्राह्मण, गुरु, गाय और साधुओं की सेवा करनी चाहिए। कहते हैं कि ऐसा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।

खरमास में सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान, संध्या आदि करके भगवान का स्मरण करना चाहिए।

खरमास के दौरान क्या न करें-

खरमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश आदि मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए। कहते हैं कि ऐसा करने से अशुभ फल की प्राप्ति होती है।

 खरमास में जमीन पर सोना चाहिए। इसके अलावा पत्तल पर भोजन करना शुभ माना गया है।

खरमास के दौरान लड़ाई-झगड़ा और झूठ बोलने से बचना चाहिए।

खरमास के दौरान मांस-मदिरा आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।

खरमास से जुड़ी पौराणिक कथा- 

प्रचलित एक कथा के अनुसार, एक बार सूर्य देवता अपने सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के लिए निकल पड़ते हैं। लेकिन इस दौरान उन्हें कहीं पर भी रुकने की इजाजत नहीं थी। यदि इस दौरान वह कहीं रुक जाते, तो पूरा जनजीवन भी ठहर जाता। परिक्रमा शुरू की गई, लेकिन लगातार चलते रहने के कारण उनके रथ में जुते घोड़े थक गए थे और घोड़ों को प्यास लगने लगी।

घोड़ों की उस दयनीय दशा को देखकर सूर्य देव को उनकी चिंता हो आई। इसलिए घोड़ों को आराम देने के लिए वह एक तालाब के किनारे चले गए, ताकि रथ में बंधे घोड़ों को पानी पीने को मिल सके और थोड़ा आराम भी। लेकिन तभी उन्हें यह आभास हुआ कि अगर रथ रुका, तो अनर्थ हो जाएगा, क्योंकि रथ के रुकते ही सारा जनजीवन भी ठहर जाता। उस तालाब के किनारे दो खर यानी गर्दभ भी खड़े थे। जैसे ही सूर्यदेव की नजर उन दो खरों पर पड़ी, उन्होंने अपने घोड़ों को विश्राम करने के लिए वहीं तालाब किनारे छोड़ दिया और घोड़ों की जगह पर खर यानी गर्दभों को अपने रथ में जोड़ दिया, ताकि रथ चलता रहे। लेकिन उनके कारण रथ की गति काफी धीमी हो गई।

फिर भी जैसे-तैसे किसी तरह एक मास का चक्र पूरा हुआ। उधर सूर्य देव के घोड़े भी विश्राम के बाद ऊर्जावान हो चुके थे और पुन: रथ में लग गए। इस तरह हर साल यह क्रम चलता रहता है और हर सौरवर्ष में एक सौर मास ‘खर मास’ कहलाता है।  

Share This Post